आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

मन में तू बसा है

                
                                                         
                            मन में तू बसा है
                                                                 
                            
मेरे मन में तू बसा है
पल पल हर पल
ढूंढूं कलकल
तेरा निशां कहां है

मन में तू बसा है
मेरे मन में तू बसा है

ये ख़ाली, रूखा सा
मौसम आया कैसे
राह में
भर जाता है पल पल
मेरा रोम रोम
इक आह से
आंख़ें मेरी खोजे तुझको
मन कसमसा है

मन में तू बसा है
मेरे मन में तू बसा है

देती थी जो राहत
प्रीत आज ख़ता
वो बन गई
जाने अनजाने में
एक ख़ताकार
मैं बन गई
इस रस्ते पे
सूनेपन की
मिली मुझे सज़ा है

मन में तू बसा है
मेरे मन में तू बसा है

कैसे कर लूं यारी
इस एकाकीपन के आलम से
रहना मुश्किल हो रहा
है दूर अपने बालम से
नागिन जैसे
ख़ामोशी से
रुत ने मुझे डसा है

मन में तू बसा है
मेरे मन में तू बसा है
पल पल हर पल
ढूंढूं कलकल
तेरा निशां कहां है

मन में तू बसा है
मेरे मन में तू बसा है
- शीतल अग्रवाल
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
14 मिनट पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर