विरले होते जो लेखन से इतिहास बदलते हैं
पथ बनाते हैं स्वयं, होके निडर फिर चलते हैं
छायावादी युग में ऐसी ही इक कवयित्री आई
मनवाकर लोहा अपना, जो आधुनिक मीरा कहलाई
नारी के मन की पीड़ा को, कविता में उतारा था
लिखकर अपने संस्मरण, स्व-व्यथा को पुकारा था
स्त्री अस्मिता, संघर्षों का रेखाचित्र उकेरा था
निबंधों के माध्यम से, नारी-सशक्तिकरण बिखेरा था
खंडन किया व्यवस्था का, कलम को अपनी तलवार किया
नारीवाद का नेतृत्व कर, रूढ़िवाद पर प्रहार किया
'घिसा की माँ' सी औरतें, अब भी जग में दिख जाती हैं
भक्तिन, बिबिया और लछमा, दर-दर की ठोकरें खाती हैं
मिले अधिकार स्त्री को भले, पर समाज का सत्य नहीं बदला
कालक्रम तो बदल गया, पर सोच का आधिपत्य नहीं बदला
आज भी उनकी रचनाओं में, नारी की चीखें सुनाई देती हैं
हर एक नारीवादी विचार में, महादेवी वर्मा दिखाई देती हैं
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