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मानसिकता का खेल

                
                                                         
                            जब अत्याचार हुआ औरत पर, आँखें रोईं इस मर्द जात की।
                                                                 
                            
जागी अगर तुम सड़कों पर, ना रातें सोईं इस मर्द जात की।

तुमसे भी ज़्यादा चाहा सदा कि नारी को सम्मान मिले।
सोलह शृंगार से भी पहले, उसे शृंगार में स्वाभिमान मिले।

आज खड़ा किया है कटघरे में, जिसने पूरी मर्द जात को।
शायद समझ न पाई कभी वो अपने घर की मर्द जात को।

जन्म से लेकर जवानी तक, पाला है इसी मर्द जात ने।
हर क़दम पर साथ रहकर, संभाला है इसी मर्द जात ने।

समाज की बंदिशें तोड़कर, आगे बढ़ाया मर्द जात ने।
ज़माने के दिए हज़ार तानों का भार उठाया मर्द जात ने।

कोई भाई, बेटा, कोई पिता, कोई सखा है मर्द जात में।
सब पर लांछन लगा दिया है, कौन बचा है मर्द जात में?

जो तपता रहा सदा धूप में, सदा विष का घूँट पिया।
आज उसी त्याग की मूरत को, कटु शब्दों का घाव दिया।

हर पुरुष में रावण नहीं है, कोई मर्यादा पुरुषोत्तम भी है।
जो समझता है स्त्री को केवल स्त्री, ऐसा पावन मन भी है।

चुन-चुन कर उस सोच को बदलो, जो बनती है हैवानियत।
लिंग देखकर न्याय न बदलो, बदलो अपनी असल नीयत।

अपराध का नहीं कोई लिंग, न जाति और न ही धर्म है।
एकमात्र कारण विकृत मानसिकता से हुआ कुकर्म है।

 
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एक घंटा पहले

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