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जो न देख सके संसार

                
                                                         
                            यह देख जगत की माया,
                                                                 
                            
भूखे पेट जब मैं सोया,
चोरी की डाका डाला,
समाज की नींव को ललकारा,
अब जब मैं दोषी हूँ,
अंधकार का ज्योतिषी हूँ,
क्या जुर्म मेरा है यूँ विशाल
जो दंड मिले मुझे बेमिशाल
जब वे अपनी जेबें भरते हैं,
हम गरीबों को हरते हैं,
क्या नहीं ठगी हैं उनके काम
जब वे घुस लेते हर शाम
राजनीति के प्रचंड में,
लूटते हैं ये धन-श्याम
और आदर्शवाद के पाप के पीछे
छुपे हुए हैं इनके राम
तो मैं क्या अब अपराधी हूँ?
रोटी का भी अभिलाषी हूँ;
क्या जुर्म मेरा है इस प्रकार
जो न देख सके संसार।
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1 hour ago

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