दे रहा है नभ दिलासा,
आज मौसम है खुला सा,
सुबह से पर खोल उड़ते,
परिंदे करते खुलासा,
आसमां से नीर टपका,
घुल गया जल में बताशा,
धूप फिर से खिलखिलाई,
छंट गई मन से निराशा,
जीतकर बाजी पुरानी,
फेंक फिर से नया पाशा,
मिटे कड़वाहट दिलों से,
बोल ऐसी मधुर भाषा,
प्रेम और विश्वास से ही,
घोंसला लगता नया सा,
धैर्य रख 'गुंजन' हृदय में,
दूर भागे ख़ुद हताशा,
-शशि भूषण मिश्र 'गुंजन'*
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