आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

आसमां से नीर टपका

                
                                                         
                            दे रहा है नभ दिलासा,
                                                                 
                            
आज मौसम है खुला सा,

सुबह से पर खोल उड़ते,
परिंदे करते खुलासा,

आसमां से नीर टपका,
घुल गया जल में बताशा,

धूप फिर से खिलखिलाई,
छंट गई मन से निराशा,

जीतकर बाजी पुरानी,
फेंक फिर से नया पाशा,

मिटे कड़वाहट दिलों से,
बोल ऐसी मधुर भाषा,

प्रेम और विश्वास से ही,
घोंसला लगता नया सा,

धैर्य रख 'गुंजन' हृदय में,
दूर भागे ख़ुद हताशा,
-शशि भूषण मिश्र 'गुंजन'*
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
5 घंटे पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर