आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

काश कोई समझता

                
                                                         
                            न हम भी किसी से रुठे होते
                                                                 
                            
न हमारे वादे भी झूठे होते
हमें भी कोई नया मिलता
मेरे भी साथ कोई फूल खिलता
हमें भी काश कोई समझता
हम भी तेरे सपनों में खो जाते
कुछ बीते पल हमको भी याद आते
मैं भी तुझपे मरा करता
हमें भी काश कोई समझता
हम भी उपवन में तेरे पीछे भागते
तेरी खातिर रातों में जागते
छोड़ अपना काम, यूं ही सजा करता
हमें भी काश कोई समझता
हम भी आसमां से तारे तोड़ लेते
तुझसे नया रिश्ता जोड़ लेते
तेरा भी चेहरा चन्दा सा चमकता
हमें भी काश कोई समझता
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
एक वर्ष पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर