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वापसी… खुद की, खुद से ही : प्रतीकात्मक–दार्शनिक गीतिका

                
                                                         
                            दुनिया की गलियों में भटका,
                                                                 
                            
अपना पता तलाशता रहा,
दर्पण में चेहरा दिखता था,
पर भीतर से मैं खोता रहा॥

नाम मिला, पहचान मिली,
फिर भी मन अनजान रहा,
सबको पढ़ता रहा उम्रभर,
खुद का पन्ना अनपढ़ा रहा॥

एक दिवस जब राह थमी तो,
शोर स्वयं ही मौन हुआ,
बाहर जितना खोजा मैंने,
उत्तर भीतर प्रकट हुआ॥

आँखें मूँदीं—द्वार खुला,
जिसे खोजता था, पास मिला,
जिसको समझा दूर सदा ही,
वह मेरे ही श्वासों में खिला॥

अब न कोई दूर दिशा है,
न मंज़िल की चाह रही,
जिससे बिछड़ा था जीवनभर,
वही अंतस में मिलती रही॥

न खुद से कोई प्रश्न बचा है,
न कोई उत्तर माँग रहा,
मैं जैसा हूँ—वैसा होकर,
अपने भीतर लौट रहा॥

दुनिया से यह लौटना कैसा—
दुनिया तो वहीं खड़ी रही,
वापसी हुई बस मेरी ही—
खुद की… खुद से ही…
- सनातन मुकुंद
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 घंटे पहले

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