गिर कर पग संभलना सीखे,
जीवन दीप-सा जलना सीखे।
ठोकर ने जगाई सुप्त चेतना,
हम धर्म-पथ पर चलना सीखे।
घायल-पत्थर ने सूरत संवारी,
चोट मीत औ' माॅं-सी प्यारी।
मूरत बन जो सदा पूजित हुई,
ठोकर—नव विहान-सी न्यारी।
कठिन डगर के निस्तब्ध घाव,
निकल पड़े लेकर नव प्रभाव।
हर ठोकर से प्राण-स्वर बंधते,
मिलता शुभ जीवन का भाव।
विषाद न संताप मानो इसको,
सीख मिली अनमोल जिसको।
हर ठोकर बने कविता का छंद,
अमृत-सा मिला जग में किसको।
— श्री सनातन मुकुंद
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