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उत्सव बनकर ऋतु मुस्काई, पात-पात पर रंग खिले

                
                                                         
                            मन में कोई मधुर राग छिड़ा, अधरों पर मुस्कान खिली,
                                                                 
                            
नयनों में सपनों की सरिता, साँसों में मधु-गंध घुली॥

कृष्ण कदंब की छाँव तले, रुनझुन पायल बोल उठे,
मुरली की मीठी तान सुनाकर, सूने मन के द्वार खुले।
नील गगन में प्रेम उतरकर, चाँद सितारे झूम उठे,
श्याम छवि की एक झलक से, अंतर के उपवन फूल उठे॥

कालिंदी की लहरों पर जब, चाँदनी चुपके उतर गई,
जलतरंग-सी हँसी किनारे, रेशम-धुन में बिखर गई।
नाव बनी यह साँस हमारी, पतवार बना अनुराग,
लहर-लहर में प्रेम पिघलता, मन गाता मधुमय राग॥

अमावस की गहन घटा में, दीपक बनकर नेह जला,
तम के माथे ज्योति सजा दी, पल में मन का भय टला।
टूटी वीणा के तारों में, फिर मधुरिम संगीत जगा,
एक किरण ने छूकर मन को, सोया अंतर फिर से जगा॥

उत्सव बनकर ऋतु मुस्काई, पात-पात पर रंग खिले,
फूलों ने सुगंध लुटाई, मधुकर के स्वर संग मिले।
हृदय-आँगन प्रेम-सुधा से, आज स्वयं ही भरता जाए,
जीवन की हर साँस सुहानी, गीत नया बन गाती जाए॥
- सनातन मुकुंद
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एक दिन पहले

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