हिमगिरि ने जब मौन तपोवन, रक्तिम मंत्र उचारा था,
तब सीमा के प्रत्येक शिलाखंड ने व्रत दोहराया था।
शिखर नहीं वे केवल पत्थर, ऋषियों के संकल्प प्रखर,
जहाँ हिमालय दीपक बनकर जलता युग-युग निरंतर।
बर्फ नहीं थी—श्वेत यज्ञ की पावन भस्म-विभूति वहाँ,
वीरों ने आहुति बनकर लिख दी अमर उजास वहाँ।
तलवारों का अर्थ न केवल रण में शत्रु हर लेना है,
धर्म बचाने को मुस्काकर स्वयं अग्नि बन जाना है।
कारगिल केवल युद्ध नहीं था—चेतन युग का जागरण,
हर सैनिक में बोल रहा था भारत का सनातन मन।
जो गिरकर भी उठते रहते, वे ही पर्वत कहलाते,
जो मिटकर भी दीप जलाएँ, वे इतिहास बन जाते।
रक्त नहीं था—राष्ट्रवृक्ष की जीवन-सरिता बहती थी,
हर बूँद में आने वाले युग की वाणी रहती थी।
आज तिरंगा केवल ध्वज नहीं, आत्मा का उद्घोष बने,
हर नागरिक के अंतर्मन में कर्तव्याग्नि का जोश जगे।
विजय-दिवस का सच्चा वंदन पुष्प चढ़ाना मात्र नहीं,
अपने भीतर जागे भारत—इससे बढ़कर यज्ञ नहीं।
- सनातन मुकुंद
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X