सावन संग प्रीत लगी रे, मन-मयूर मुसकाया,
घन ने नभ के नील कपोलों पर, काजल-रंग सजाया।
बूँदों ने पायल छनकाई, धरती ने राग सुनाया,
सूने मन के वन में फिर से, नेह-सुमन मुसकाया।
सावन संग प्रीत लगी रे, मन-मयूर मुसकाया,
भीगी-भीगी पुरवैया ने, प्रेम-संदेशा लाया।।
घिर-घिर आए घन मतवाले, श्यामल रूप सजाए,
दामिनि ने नभ के अधरों पर, स्वर्णिम हास खिलाए।
कदंबों ने बाहें फैलाकर, मेघों को गले लगाया,
वन ने हरित चूनर ओढ़ी, नव-श्रृंगार सजाया।
सावन संग प्रीत लगी रे, मन-मयूर मुसकाया,
भीगी-भीगी पुरवैया ने, प्रेम-संदेशा लाया।।
माटी ने सौंधे अधरों से, पहली बूँद चुमाई,
जैसे विरही धरती ने फिर, प्रिय की पाती पाई।
तृण-तृण पर मोती झिलमिल, पत्ती-पत्ती हँसती,
बूँद-बूँद में नभ की आँखें, प्रेम-कथा हैं कहती।
सावन संग प्रीत लगी रे, मन-मयूर मुसकाया,
भीगी-भीगी पुरवैया ने, प्रेम-संदेशा लाया।।
नदिया ने कंगन खनकाए, लहरों ने ली अंगड़ाई,
पर्वत ने मेघों के संग फिर, रिमझिम धुन दोहराई।
वन की वीणा पर पवन ने, मधुर मल्हार सुनाया,
कोयल की मीठी कूक ने, मिलन-राग बरसाया।
सावन संग प्रीत लगी रे, मन-मयूर मुसकाया,
भीगी-भीगी पुरवैया ने, प्रेम-संदेशा लाया।।
हर डाली झूले पर झूमी, हर पत्ती हरषाई,
हरी चुनरिया ओढ़ धरा ने, नव-वधु-सी लजाई।
चाँद नदी के नील दर्पण में, अपना रूप निहारे,
तारों की झिलमिल चुनरी में, रात सुनहरे स्वप्न सँवारे।
सावन संग प्रीत लगी रे, मन-मयूर मुसकाया,
भीगी-भीगी पुरवैया ने, प्रेम-संदेशा लाया।।
सावन केवल ऋतु नहीं है, अंतर का उल्लास है,
सूखे मन की धरती पर यह, नेह-सुधा की आस है।
घन बनकर जो दूर गया था, बूँद बनकर आया,
मन ने जिसको गीत कहा था, सावन ने गुनगुनाया।
सावन संग प्रीत लगी रे, मन-मयूर मुसकाया,
भीगी-भीगी पुरवैया ने, प्रेम-संदेशा लाया।।
ऋतु जाएगी, घन छँट जाएँगे, थम जाएगी बरसात,
फिर भी भीगी माटी रखे, सावन की सौगात।
जब-जब पवन सुमन सहलाए, जब-जब मेघ घिरें,
मन के सूने आँगन में फिर, प्रेम-फुहारें झरें।
सावन संग प्रीत लगी रे, मन-मयूर मुसकाया,
भीगी-भीगी पुरवैया ने, प्रेम-संदेशा लाया।।
-सनातन मुकुंद
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