घन-घन नभ में डमरू बाजे, सावन शिव का गान हुआ,
बूँद-बूँद में रुद्र-स्वर झरता, जग सारा कल्याण हुआ।
नील गगन की जटाओं से जब, मेघ-गंगा उतर आई,
धरती ने हर श्वास में जैसे, शिव-स्मृति फिर दोहराई।
कंठ-विष की कालिमा भीतर, नीलकंठ मुस्काते हैं,
जग के सारे ताप स्वयं पी, अमृत-दीप जलाते हैं।
बिल्व-पत्र की हरित शिरा में, तप की कथा सुहाती है,
शिव के चरणों पर जो झुकती, अहं-लता मुरझाती है।
त्रिनयन की ज्योति जगे तो, तम का तिल भी टिकता नहीं,
शिव-संकल्प जगे अंतर में, मृत्यु-भय फिर टिकता नहीं।
चंद्रकला जब शीश विराजे, मन-आकाश निखरता है,
गंगा बनकर चेतन-धारा, अंतर-शिव में उतरती है।
नाग गले में सिखलाता है—भय को वश में करना है,
भस्म-विभूति कहती—तन को अंततः मिट जाना है।
तांडव केवल प्रलय नहीं है, नव-सृजन का छंद भी है,
शिव के मौन हृदय में छिपा, अनहद नाद अखंड भी है।
सावन केवल ऋतु नहीं है, यह भीतर का अभिषेक है,
बूँद-बूँद में आत्मा पाती, शिव से अपना साक्षात्कार है।
जब मन की सूखी धरती पर, श्रद्धा-मेघ बरसते हैं,
तब कण-कण में कैलास उगता, शिव स्वयं मुस्काते हैं।
जिसने अपना ‘मैं’ अर्पित कर, शिव-शून्य में खोया है,
उसने ही इस सावन में, अमृत-तत्त्व को पाया है।
शिव केवल कैलास में नहीं, अंतरतम की ज्योति हैं,
सावन की हर बूँद कहती—“तुम ही शिव हो, शिव ही ज्योति हैं।”
- सनातन मुकुंद
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X