संस्कार—
क्या केवल स्मृति है,
या स्मृति के विलुप्त हो जाने पर भी
अन्तःकरण में अवशिष्ट वह अदृश्य स्पन्दन,
जो जन्म से पूर्व भी मौन था
और मृत्यु के पार भी मौन रहेगा?
किसने अंकित किया चित्त पर प्रथम संस्कार—
माता ने, पिता ने, गुरु ने, परम्परा ने, या वह साक्षी,
जो देह के आविर्भाव से पूर्व
अज्ञात आलोक की भाँति स्वयं में स्थित था?
यदि संस्कार
चित्त की रेखा है,
तो चित्त के परिवर्तन के साथ वह भी क्यों बदलता है?
और यदि वह आत्मा की छाप है,
तो आत्मा किसी छाप से कैसे आबद्ध हो सकती है?
तब प्रश्न उठता है—संस्कार किसका?
चित्त—अनुभवों की सञ्चित धूल।
वासना—उसी धूल में अंकुरित अदृश्य आकांक्षा।
अहं—उस आकांक्षा को ‘मेरा’ कहकर
बंधन में रूपान्तरित करता हुआ सूक्ष्म अध्यास।
पर साक्षी?
वह न अंकित होता है, न मलिन;
न पवित्र, न अपवित्र;
न जन्मता, न क्षीण होता;
न किसी संस्कार से अपना स्वरूप बदलता।
तो क्या संस्कार
आत्मा को परिष्कृत करता है?
नहीं—
वह केवल चित्त पर जमे
अविद्या-आवरण को
धीरे-धीरे पारदर्शी करता है।
जैसे मेघ
सूर्य को स्पर्श नहीं करते,
केवल दृष्टि में
सूर्य के अभाव का भ्रम रचते हैं;
वैसे ही अविद्या
आत्मप्रकाश को ढँकती है—
नष्ट नहीं करती।
अहं कहता है—“मैं कर्ता हूँ।”
वासना कहती है—“मुझे चाहिए।”
मोह कहता है—“यह मेरा है।”
और साक्षी—कुछ नहीं कहता।
वह मौन क्या निष्क्रियता है?
नहीं—
वही तो
चैतन्य का अनाहत नाद है।
साधना—उस मौन को सुन लेना है;
न स्वयं को नया बनाना,
न किसी आदर्श की प्रतिमा गढ़ना;
केवल इतना देखना कि जो ‘मैं’ नहीं हूँ,
उससे अपनी पहचान
एक-एक करके विसर्जित होती जाए।
देह—दृश्य।
मन—दृश्य।
विचार—दृश्य।
भाव—दृश्य।
वासना—दृश्य।
अहं—दृश्य।
तो—
द्रष्टा कौन है?
प्रश्न भीतर उतरता है,
उत्तर शब्द बनकर नहीं आता।
एक निस्तब्ध रिक्ति उतरती है—
पर वह रिक्ति शून्य नहीं;
वह स्वप्रकाशित पूर्णता है।
वहीं संस्कार
आचरण से ऊपर उठकर
अन्तःप्रकाश का माध्यम बनता है;
करुणा
कर्तव्य से मुक्त होकर स्वभाव होती है;
सत्य
विचार से आगे बढ़कर अस्तित्व बनता है;
और प्रेम
सम्बन्ध की सीमाएँ गलाकर
अद्वैत का स्पन्दन हो जाता है।
तभी राम
इतिहास से उठकर धर्ममय चेतना होते हैं;
कृष्ण
कथा से निकलकर
निष्काम कर्म का अन्तर्नाद बनते हैं;
बुद्ध प्रतिमा से विलीन होकर
निर्विकार करुणा होते हैं;
और शिव—
रूप से परे
अहं-विलय का अनन्त मौन।
तब ज्ञात होता है—
संस्कार
किसी बाहरी व्यवस्था का
केवल अनुशासन नहीं था;
वह तो अन्तःस्थित सत्य की विस्मृत स्मृति था।
और आत्मबोध?
किसी नवीन उपलब्धि का नाम नहीं—
यह जान लेना है कि
जिसे पाने के लिए अनगिन यात्राएँ कीं,
वह यात्री से एक कदम भी बाहर कभी था ही नहीं।
तब—
न संस्कारक, न संस्कार्य, न संस्कार की प्रक्रिया;
न साधक, न साध्य, न साधना—
केवल चैतन्य।
न उसका नाम, न आकार;
न भीतर, न बाहर;
न ‘मैं’, न ‘तू’—
केवल वह।
और उस अन्तिम मौन में
एक अदृश्य बोध स्वयं से कहता है—
“जिस दीप को तू
युगों से जलाता रहा,
वह कभी बुझा ही नहीं था;
बुझा था—केवल तेरा विस्मरण।”
-सनातन मुकुंद
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