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समय की डोर से बंधा मनुष्य : प्रतीकवादी–दार्शनिक छंदमुक्त कविता

                
                                                         
                            ।। समकिसी ने समय का मुख नहीं देखा,
                                                                 
                            

फिर भी हर श्वास उसकी अनाम डोर पर
धीरे-धीरे झूलती रहती है।

मनुष्य— उड़ती हुई पतंग नहीं,
अपने ही आकाश का बंधा हुआ विस्तार है।

वृक्ष हर ऋतु में अपने पत्तों का शोक नहीं मनाता;
वह केवल जड़ों की
एक और मौन गाँठ स्वीकार कर लेता है।

पर्वत अपनी ऊँचाई का
कभी उद्घोष नहीं करता;

वह शताब्दियों से
अपने भीतर टूटती हुई प्रतिध्वनियों को
चुपचाप सँभाले रहता है।

नदी समुद्र तक नहीं पहुँचती—

वह अपने नाम का
अंतिम अक्षर जल में
विसर्जित करती चलती है।

क्षितिज हर संध्या
एक और दूरी समेट लेता है,

किन्तु कोई पथ
अपने अंतिम मोड़ को
पहचान नहीं पाता।

रेतघड़ी में रेत नहीं गिरती;

धीरे-धीरे मनुष्य का
अदृश्य अहं अपने ही भार से
झरता रहता है।

दीप अंधकार से नहीं लड़ता;

वह
अपने ही क्षय को
प्रकाश में
रूपांतरित करता रहता है।

जब उसने डोर तोड़नी चाही,
बंधन नहीं टूटा—

केवल उसके प्रश्न
दूसरी दिशा में बहने लगे।

तब मौन ने कुछ भी नहीं कहा।

और उसी निस्पंद क्षण
छाया अपने स्रोत में लौट गई।

डोर का
दूसरा सिरा
भीतर उतर गया।

तभी ज्ञात हुआ—

गाँठ
कभी डोर में थी ही नहीं।
- सनातन मुकुंद
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43 मिनट पहले

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