रिमझिम सावन की फुहार, ऋत-चेतन का मौन निमंत्रण।
अंतर-धरा पर झर-झर बरसे, चिदाकाश का दिव्य स्पंदन॥
तृषित प्रतीक्षा की वल्लरियों में, प्रज्ञा-पल्लव फिर लहराएँ।
करुणा-मेघों की मौन वाणी, जीवनोदक स्वयं बरसाए॥
बूँद-बूँद में ब्रह्मनिनाद, नित्य-सत्य स्वयं झलकाए।
क्षण-दर्पण में क्षर जग का, अक्षर-तत्त्व स्वयं झलकाए॥
अहं-रज जब धुलती जाए, निर्मल हो अंतर का कानन।
त्याग-सुमन से सुवासित हो, जीवन का पावन उपवन॥
हरित तृणों की मौन ऋचाएँ, विश्वात्मा का गीत सुनाएँ।
पर्ण-पर्ण पर ऋत-रेखाएँ, शाश्वत लिपि बन उभर आएँ॥
नीलांबर-ध्यान-कमल से, अमृत-ज्योति निरंतर झरती।
जो निज सीमाएँ विसर्जित करे, वही अनंत में उतरती॥
रिमझिम सावन की फुहार, केवल जल-अवतरण कब?
करुणा-ब्रह्म का पावन, चेतन-अग्नि पर दिव्य अर्घ्य॥
भीतर सावन जब उतरता, बाहर जग भी हरित हो जाता।
आत्मदीप से आलोकित चेतन, चिदाकाश में लय हो जाता॥
- सनातन मुकुंद
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