माटी-मन की गहन धरा में, ज्ञान-बीज जब बोया है,
पुस्तक-जल की अमृत-बूँदों ने, चेतन-अंकुर सींचा है।
शब्द बने हैं मंत्र-दीप जब, तम का आवरण गलता है,
अंतरतम की मौन गुफा में, सत्य-सूर्य फिर उगता है।
पृष्ठ-पृष्ठ पर प्राची जागे, अक्षर बनकर अरुणाई,
एक विचार की किरण उतरकर, हर ले मन की तिमिराई।
पुस्तक केवल पन्ने नहीं हैं, वे चेतन के द्वार हैं,
जिनमें सोए युग-युग के सब, अनुभव के भंडार हैं।
ज्ञान-तरु जब भीतर फलता, दृष्टि गगन तक जाती है,
जड़ धरती में गहरी होती, शाखा नभ छू आती है।
विचारों की निर्मल सरिता, संस्कारों को सींचती है,
चेतना स्वयं को पढ़ते-पढ़ते, निज ब्रह्म-ज्योति पाती है।
आशा बनकर शब्द झरें तो, सूना मन मुस्काता है,
विवेक-वायु के मृदु स्पर्श से, जीवन-पथ जगमगाता है।
अज्ञान का घना कुहासा, धीरे-धीरे छँट जाता है,
ज्ञान-ज्योति के एक स्पर्श से, अंतर-दीप जल जाता है।
पुस्तक खोले तो जैसे कोई, मौन ऋषि बोल उठता है,
शब्दों के उस पार अनाहत, कोई नाद डोल उठता है।
जो अक्षर को आत्मा पढ़ ले, वही ज्ञान का ज्ञाता है,
बाह्य जगत् से अंतर्जगत् तक, वही स्वयं को पाता है।
ज्ञान नहीं केवल संचय है, यह जीवन का प्राण बने,
बुद्धि से हृदय, हृदय से चेतन, चेतन से भगवान बने।
बीज स्वयं जब वृक्ष हो जाए, फिर वन बनता जाता है—
एक प्रकाशित चेतन से, युग का तम हर जाता है।
- सनातन मुकुंद
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