मौन अधर पर ऋतु ने जैसे, कोई मंत्र लिखाया है,
करुणा के अदृश्य स्पर्श ने, अंतर-पट खुलवाया है।
कदंब-गंध में स्मृति का कोई, गूढ़ लोक मुसकाता है,
माटी का कण-कण अपने ही, आदि-स्वर दोहराता है।
झींगुर-झंकारों में कोई, सूक्ष्म शंख-स्वर बजता है,
मन के निर्जन तट पर फिर, कौन अनाम उतरता है।
श्याम घटाओं के अंतर में, कौन स्वयं को ढकता है,
रूप बदलती सृष्टि में भी, अचल सत्य रह जाता है।
पर्ण-पर्ण की क्षणिक सरगम, क्षणभंगुरता गाती है,
मिटने के उत्सव में सत्ता, अपना सत्य पाती है।
तम के गर्भ में पलता कोई, उजले सत्य का बीज है,
रज-तम के उस पार अनश्वर, एक सनातन तेज है।
पावस बाहर पर्व मनाता, भीतर यज्ञ जगाता है,
काम-क्रोध की शुष्क समिधा, चेतनाग्नि जलाता है।
निज-अहं जब गल जाता है, ‘मैं’ का कहाँ ठिकाना है,
पावस तब अध्यात्म बनकर, आत्मा में ही बहता है।
-नातन मुकुंद
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