नौ दिन चढ़े अढ़ाई कोस, फिर भी कैसी शान है,
पाँवों में पथ सोया-सोया, माथे पर अभिमान है।
घड़ी बजाती जागरण की, निद्रा ओढ़े गाँव है,
दीप जले चौपालों में, भीतर अब भी ठाँव है।
नक्शों पर नदियाँ दौड़ें, धरती प्यासी-प्यासी है,
कागज़ पर हरियाली उगे, खेतों में उदासी है।
शंख बजे उद्घोषों के, कर्म हुआ निष्प्राण,
शब्दों के रथ दौड़ रहे, थककर बैठा प्राण।
सीढ़ी पर चढ़ते-चढ़ते, पाँव गिने सौ बार,
शिखर वहीं का वहीं खड़ा, हम ही हुए लाचार।
मंथन की मुद्रा गहरी, घट में विष का वास,
अमृत की बातें करते, बाँट रहे संत्रास।
सूरज रोज़ क्षितिज चढ़ता, हम छाया में सोते हैं,
समय-सरित आगे बहती, हम तट पर ही रोते हैं।
नौ दिन चढ़े अढ़ाई कोस—इतना ही यदि ज्ञान,
तो गति केवल पग में कैसी, जागे अंतःप्राण।
राह बदलने से पहले कुछ, दृष्टि बदलनी होगी,
बाहर की जड़ता गलने को, भीतर ज्योति जलानी होगी।
नौ दिन चढ़े अढ़ाई कोस—हँसती है इतिहास की धूल,
चलना केवल पाँवों का नहीं, जागरण है मूल।
जिस दिन चेतन कदम बढ़ेंगे, टूटेगा यह दोष,
पग से पथ इतिहास लिखेंगे, कहाँ अढ़ाई कोस!
-सनातन मुकुंद
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X