काल-बेल पर झूले जीवन-पात।
मौन दिशाएँ बुनतीं अदृश्य गात।
बीज सँजोए वन का गुप्त विधान।
रेत लिखे जल पर अमिट प्रमाण।
दीप जले जब थक जाए तूफ़ान।
छाया बोले धूप का गूढ़ गान।
नभ के पत्र पढ़े निश्चल विहान।
शून्य रचे प्रतिपल सृष्टि-विधान।
पग-पग चलती अनदेखी प्रज्ञा।
नियति मुसकाए—मौन उपासना॥
- सनातन मुकुंद
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