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मौनलिपि का अनामाधार : प्रतीकवादी छंदमुक्त कविता

                
                                                         
                            किसी दर्पण ने
                                                                 
                            
उसका मुख नहीं लौटाया।

फिर भी हर वृक्ष
उसी की अपठित लिपि में
ऋतुओं का नाम लिखता रहा।

पत्थर—किसी विस्मृत स्वप्न के
बंद अक्षर हैं।

नदियाँ—उनके बीच छूटे हुए
मौन के विराम।

एक अँधा बीज बहुत पहले से
अँधेरे को भीतर-भीतर
प्रकाश में अनुवाद कर रहा है।

पर्वत—किसी अनसुनी श्वास के
जमे हुए उच्चारण हैं।

आकाश—अपना रिक्त पात्र
हर बार वहीं रख जाता है,
जहाँ कोई द्वार नहीं।

मैं जितना भीतर धँसा,
उतना ही पाया—
ऊँचाई, गहराई का ही
भूला हुआ नाम है।

और जब मेरे अंतिम नाम का
कण भी झर गया,

तब जाना—

मैं उसे नहीं खोज रहा था;

वही अनादि से
मेरे होने का
अनकहा अर्थ पढ़ती रही।

- श्री सनातन मुकुंद
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8 घंटे पहले

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