मौन मेरा आश्रय नहीं—
मेरी प्रकृति है;
जैसे हिमालय
अपने शिखरों पर हिम धारण कर
नदियों को जन्म देता है।
मैंने सीखा है—
दीपक
कभी अंधकार से युद्ध नहीं करता;
वह केवल जलता है,
और रात स्वयं पीछे हट जाती है।
नदी
चट्टानों से वैर नहीं करती;
किन्तु जब उसका पथ बाँध दिया जाता है,
वह अपने ही मौन का गर्जन बन जाती है।
वृक्ष
अपने फलों का स्वाद
स्वयं नहीं चखता;
वह झुककर भी
दान का ही उत्सव रचता है।
समुद्र
असंख्य नदियों का वेग
अपने भीतर समेट लेता है,
किन्तु अपनी मर्यादा का
अतिक्रमण नहीं करता;
गहराई का धर्म
कोलाहल नहीं,
धैर्य होता है।
बीज
धरती के अंधकार में
पराजय नहीं खोजता;
वह मौन को
अंकुर की प्रथम प्रार्थना बना देता है।
आकाश
सबको अपने विस्तार में स्थान देता है,
किन्तु किसी का पक्ष नहीं लेता;
विराटता का अर्थ
अधिकार नहीं,
समभाव होता है।
अहिंसा
भय की शरण नहीं,
आत्मबल का अनन्त निःशब्द आकाश है;
जहाँ करुणा दुर्बल नहीं होती,
अपितु न्याय का प्रथम स्वर बनती है।
धर्म
प्रतिशोध की अग्नि नहीं,
विवेक का दीप प्रज्वलित करता है;
वह किसी का विनाश नहीं चाहता,
केवल सत्य के पक्ष में
अडिग खड़ा रहता है।
किन्तु
जब असत्य सत्य का कंठ दबाने लगे,
जब अन्याय मनुष्य की गरिमा पर आघात करे,
तब मौन भी
अपने भीतर
वज्र का एक बीज संजोता है।
उस क्षण प्रतिकार
क्रोध का नहीं,
धर्म का उदय होता है—
जैसे प्रभात,
जो किसी से प्रतिशोध नहीं लेता,
किन्तु अंधकार को
टिकने भी नहीं देता।
इसलिए—
मौन मेरी प्रकृति है,
क्योंकि करुणा मेरा स्वभाव है;
और प्रतिकार मेरा सत्य,
क्योंकि न्याय मेरा धर्म है।
- सनातन मुकुंद
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