महाशून्य की नीरवता में, तम का विस्तार,
तेरी मंद हास-किरण से, सृष्टि का संचार।
तेरे आदितेज से जागा, ज्योतिर्मय ब्रह्माण्ड,
तेरी महिमा से गूँज उठा, चराचर का गान॥
अष्टभुजा, हे आदिशक्ति! तू सृजन का आधार,
सूर्यमंडल-मध्य विराजित, तेजपुंज अपार।
तेरी प्रभा से दिशि-दिशि होता नवजीवन-संचार,
तेरे स्पंदन से गतिमय है, चर-अचर संसार॥
अणु-अणु में तेरी आभा, कण-कण में उजियारा,
प्रकृति-हृदय में नित्य बहे, तुम्हारी शक्ति-धारा।
मणिपूरक में ज्ञानाग्नि जगा, हर ले मोह-विकार,
प्रज्ञा-पुष्प अंतस में खिला दे, करुणा का विस्तार॥
क्षुद्र अहं का तम हर ले माँ, जागे आत्मप्रकाश,
सेवा, सत्य, विवेक से भर दे, जीवन में विश्वास।
जय कूष्माण्डे, जय सृजनमयी, महिमा अपरंपार,
अंतस में ज्योति जगा दे, कर जीवन उजियार॥
-सनातन मुकुंद
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