माँ के चरणों से धरा पर, पुण्य-पुष्प खिलते हैं,
माँ की ममता के स्पर्श से, पाषाण पिघलते हैं।
माँ हिमशिखर-सी धीर, निर्झर-सी रसधार,
माँ के आँचल में सिमटा, जग का सुख-संसार।
माँ तम में दीपशिखा बन, चेतन-ज्योति जगाती,
माँ की करुणा शुष्क हृदय में, प्रेम-सुधा बरसाती।
माँ की आँखों में पलते, अनगिन स्वप्न अपार,
माँ की पलकों पर ठहरा, संतति का संसार।
माँ की वाणी में गूँजे, वेदों का मधुर गान,
माँ के मौन में जागे, आत्मतत्त्व का ज्ञान।
माँ प्रकृति की प्रथम ऋचा, माँ सृजनाधार,
माँ के उर में स्पंदित, ब्रह्मचेतना अपार।
माँ ही शक्ति, माँ ही भक्ति, माँ जीवन का सार,
माँ की महिमा अपरंपार, नत सारा संसार॥
-सनातन मुकुंद
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