धूल ने ओढ़ी शिखरों की भाषा,
बूँद सँजोती सागर की आशा।
किसने देखा बीजों के भीतर,
वन-भविष्य, वसंताभिलाषा॥
रेत लिखे अनदेखे ग्रंथों को,
मौन पढ़े अनकहे अनंतों को।
कण-कण निज आकाश छिपाए,
कालातीत अव्यक्त दिगंतों को॥
सीपी हँसती रिक्त किनारों पर,
मोती रोते गहरे धारों पर।
जो खोया वह केवल आवरण,
पूर्ण खड़ा था टूटे द्वारों पर॥
तृण के भीतर वज्र सो रहा,
पल में युग का मंत्र बो रहा।
जिसने लघु में पूर्ण निहारा,
वह स्वयं में पूर्ण हो रहा॥
पत्थर केवल पत्थर कब था?
जल भी केवल निर्झर कब था?
नाम बदलते रहे युगों तक,
मौन मगर परिवर्तित कब था॥
दृष्टि अगर आकारों में अटकी,
साँस रही बस देहों तक सिमटी।
जिस दिन कण में आकाश दिखा,
उसी घड़ी हर दूरी मिटती॥
-सनातन मुकुंद
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X