अंतर-आकाश में सत्य-ज्योति, निःशब्द प्रभा बरसाती है,
मौन शिखर पर चिद्-अमृत की, निर्मल धारा मुस्काती है।
अहं-हिमालय पिघल कर जब, करुणा-सरिता बन जाता है,
सूने मन के मरु-कण-कण में, प्रेम-पलाश खिल जाता है।
कर्म-दीप की स्वर्णिम लौ से, तम का तिलिस्म मिट जाता है,
आत्म-ज्योति जब विश्व-हृदय में, मंगल-सूर्य उगाता है।
जब ‘मैं’ गलकर ‘हम’ में ढलता, भेद सभी मिट जाते हैं—
तब अंतर के अनहद नभ में, कल्याण-राग जग जाते हैं।
- सनातन मुकुंद
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