जीवन एक बहती सरिता है, सुख-दुःख इसकी दो धारा,
एक सुधा-सी शीतल बहती, एक विरह-विषधारा।
कर्म-शिला से टकरा-टकरा, गाती जीवन-वाणी,
हर स्पन्दन में छिपी हुई है, अनहद की अमर कहानी।
मोह-मरीचिका के वन में जब, चित्त भटकता जाता,
अन्तर्यामी मौन प्रभाकर, सत्य-पथ स्वयं दिखाता।
आशा उषा-सदृश उतरती, तम के तट को धोती,
प्रज्ञा की निर्मल किरणें फिर, अन्तर्ग्रन्थि सब खोलती।
सुख की वीणा झंकृत होती, दुःख का मन्द्र निनाद,
दोनों मिलकर रचते रहते, जीवन का गूढ़ संवाद।
काल-तरंगें उठती-गिरतीं, तट फिर भी अविचल रहता,
जो निज मूल में स्थित हो जाता, वह न विक्षोभ से डरता।
अहंकार-हिम गलता जाता, चेतन-धारा बहती,
बूँद-बूँद में ब्रह्म-दीप्ति की, अनन्त प्रभा रहती।
जब ‘मैं’ का तट विलीन हुआ, तब मिटा अहं का भार,
एक अखण्ड चिदाकाश में, बूँद हुई सिंधु-अपार।
नदी न रही, न नाम रहा फिर, न कोई पथिक, न किनारा,
सरिता सागर में लीन हुई, मिट गया भेद सारा।
कौन किनारा, कौन प्रवाह, कौन जल की धारा?
द्रष्टा-दृश्य-दर्शन मिटते, जागा आत्म-प्रकाश हमारा।
उपनिषदों का मौन यही है—बहना ही उपदेश,
बूँद स्वयं जब सागर जाने, मिटता भेद-परिवेश।
जीवन एक बहती सरिता है, सुख-दुःख इसकी दो धारा,
दोनों को अर्घ्य बना जो बहता, पाता ब्रह्म-सहारा।
-सनातन मुकुंद
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X