सावन की रिमझिम आई रे, भीगी डगरिया सारी,
कदंब तले झूला पड़े, झूमे डाली प्यारी।
ऊँची पींग गगन को छूती, हँसें सखियाँ मिल-जुल,
झूलों की सरसराहट बोले, मनवा जाए मचल।
घन घिर आए कारी बदरिया, चमके बिजुरी न्यारी,
पुरवैया संग महकी माटी, भीनी फुहारें प्यारी।
हरी चुनरिया ओढ़े धरती, झूमे डाली-डाली,
आम की डाली, झूला डोले, गूँजे हँसी मतवाली।
नदिया किनारे लहरें नाचें, गूँजे तान हमारी,
सावन के मधुर हिंडोले, झूमे दुनिया सारी।
पींगों में रिमझिम राग घुले, जागे प्रीत हमारी,
झूलों की सरसराहट में, सावन ने प्रीत सँवारी।
- सनातन मुकुंद
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