जय कूष्माण्डा, जय कल्याणी,
जय आदिशक्ति, जगन्महारानी।
अष्टभुजा, हे तेजस्वरूपा,
करुणामयी, मंगलरूपा॥
जय कूष्माण्डा, जय जगदम्बे,
जय जय हे सुखधाम।
सृष्टि-ज्योति हृदय में जगा दो,
शत-शत तुम्हें प्रणाम॥
महाशून्य में सृष्टि रचाई,
हास-किरण से ज्योति जगाई।
तेरे तेज से जग उजियारा,
तुझसे शोभित विश्व हमारा॥
जय कूष्माण्डा, जय जगदम्बे,
जय जय हे सुखधाम।
सृष्टि-ज्योति हृदय में जगा दो,
शत-शत तुम्हें प्रणाम॥
सूर्यमंडल में तेज तुम्हारा,
जगमग करता रूप उजियारा।
जीवनदायिनी, विश्वविधात्री,
भक्तजनों की भाग्यदात्री॥
अष्टभुजाओं में शक्ति समाई,
भक्तों पर करुणा बरसाई।
रोग-शोक के तम को हर लो,
माँ! जीवन में मंगल भर दो॥
जय कूष्माण्डा, जय जगदम्बे,
जय जय हे सुखधाम।
सृष्टि-ज्योति हृदय में जगा दो,
शत-शत तुम्हें प्रणाम॥
अंतस का अज्ञान मिटाओ,
प्रज्ञा का पावन दीप जलाओ।
मोह-मलिनता दूर भगाओ,
सत्य-पथ पर हमें चलाओ॥
श्रद्धा-सुमन चरणों में चढ़ाऊँ,
प्रेम-सुधा से अंतस नहलाऊँ।
शक्ति, शांति, सद्बुद्धि देना,
भक्ति-पथ पर अविचल रखना॥
जय कूष्माण्डा, जय जगदम्बे,
जय जय हे सुखधाम।
सृष्टि-ज्योति हृदय में जगा दो,
शत-शत तुम्हें प्रणाम॥
हे जगजननी! वंदन स्वीकारो,
कृपा-सुधा से अंतस तारो।
चरणों में स्थान दिलाओ,
भक्ति में अपनी हमें रमाओ॥
जय कूष्माण्डा, जय जगदम्बे,
जय जय हे सुखधाम।
सृष्टि-ज्योति हृदय में जगा दो,
शत-शत तुम्हें प्रणाम॥
- सनातन मुकुंद
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X