भाल सुशोभित अर्धचंद्र, मुख पर छवि सुखकारी,
घंटानाद से दिशि-दिशि गूँजे, स्वर मंगलकारी।
सिंहवाहिनी, दशभुजधारिणी, आदिशक्ति कल्याणी,
भय-तम हरकर ज्योति जगाती, अम्बे! भवभयहारी॥
घंटानाद की दिव्य तरंगें, सुप्त चेतना जगाएँ,
वीर-हृदय में धैर्य भरें, संकल्प अटल बनाएँ।
त्रिशूल बने विवेक की ज्वाला, खड्ग मोह को काटे,
तेरी कृपा से ज्ञान-ज्योति, अज्ञान-तिमिर मिटाए॥
शौर्य-दीप्त स्वरूप, करुणा-नयन, महिमा अपरंपार,
दुष्ट-दमन में दुर्गा प्रचंडा, भक्तों का आधार।
अर्धचंद्र की शीतल आभा, अंतःकमल खिलाए,
तेरी अभय-दृष्टि, हे जननी, आत्मप्रकाश जगाए॥
घंटानाद में ब्रह्मचेतना, अनहद रूप समाए,
शक्ति-शिव के संगम से, अंतर्बोध निखर जाए।
मोह-मलिनता हर लो अम्बे, प्रज्ञा-पुष्प खिलाओ,
जय चंद्रघंटे! घट-घट में, ब्रह्म-ज्योति जगाओ॥
-सनातन मुकुंद
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