ख़ुदी को मिटाकर जो तुझमें समाए,
वही असल में जाँ-निसार कहलाए।
न दुनिया की चाहत, न जन्नत की तमअ,
वो दर पर तुम्हारे फ़क़त सर झुकाए।
ये रंग-ए-मोहब्बत है कितना हसीं,
जो इसमें डूब जाए, वो तर के आए।
सुलगती रही रूह तन्हाई में जब,
तेरी याद के फूल फिर खिल आए।
फ़ना होने की ज़िद ले के जो निकले,
उसे राह में कोई मंज़िल न भाए।
न शिकारा 'मुकुंद', न साहिल की फ़िकर,
मज़ा डूबने का जो दिलजवाँ साथ आए।
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