वज्र टूटें, काल रूठे—हौसला कम तो नहीं,
सत्य-पथ के पंथियों का काफ़िला कम तो नहीं॥
धूप ने हर पग जलाया, छाँव ने धोखा दिया,
पंथ फिर भी पाँव ने अपना स्वयं ही गढ़ लिया।
शूल बोए जग ने जितने, फूल उतने ही खिले,
रक्त-बूँदों से धरा पर स्वप्न के निर्झर मिले।
पीर की गहराइयों में चेतना कम तो नहीं,
सत्य-पथ के पंथियों का काफ़िला कम तो नहीं॥
रात ने जब-जब निगलना चाहा उषा का स्वर्ण-वदन,
दीप ने तब-तब लिखा निज प्राण से नव-जागरण।
एक लौ के तेज ने तम की सभाएँ तोड़ दीं,
मौन की मृदु साधना ने वज्र-सी जंजीर तोड़ दी।
एक किरण में सूर्य की संपूर्णता कम तो नहीं,
सत्य-पथ के पंथियों का काफ़िला कम तो नहीं॥
बीज ने भू की समाधि में सहस्र ऋतुएँ सह लीं,
तब कहीं शाखाओं ने आकाश की बाहें गह लीं।
फल कहाँ तत्काल मिलता साधना के वृक्ष पर,
काल भी झुकता रहा है कर्म के उत्कर्ष पर।
मौन तप की यह शाश्वत साधना कम तो नहीं,
सत्य-पथ के पंथियों का काफ़िला कम तो नहीं॥
शैल से टकरा नदी ने हार का वरण न किया,
मार्ग अपना स्वयं रच डाला, किसी से डर न लिया।
सिन्धु ने बाहें पसारीं, प्यास फिर भी जीवित रही,
यात्रा ही उत्सव बनी, मंज़िल स्वयं विनीत रही।
पंथ ही जब मंत्र बन जाए, दिशा कम तो नहीं,
सत्य-पथ के पंथियों का काफ़िला कम तो नहीं॥
अग्नि ने कुंदन बनाया, आँधियों ने बल दिया,
विष ने नीलकंठ को भी अमरत्व का फल दिया।
घाव जब इतिहास बनते, राष्ट्र के श्रृंगार हैं,
जो झुके वे धूल ठहरे, जो अड़े वे पर्वताकार हैं।
वेदना की गोद में भी वंदना कम तो नहीं,
सत्य-पथ के पंथियों का काफ़िला कम तो नहीं॥
स्वेद की हर बूँद में सौ सूर्य का आलोक है,
श्रम स्वयं गीता, स्वयं उपनिषदों का श्लोक है।
भाग्य की रेखाएँ श्रम के हाथ लिखती हैं सदा,
काल की निर्जीव शिलाएँ भी पिघलती हैं सदा।
पुरुषार्थों से बड़ा कोई विधान कम तो नहीं,
सत्य-पथ के पंथियों का काफ़िला कम तो नहीं॥
पंख से ऊँची उड़ानों का गगन होता नहीं,
स्वप्न से बढ़कर मनुज का कोई धन होता नहीं।
हार केवल एक क्षण है, धैर्य शाश्वत विजय है,
जो स्वयं से जीत जाए, वह सदा अजेय है।
आत्मविश्वासों की ऐसी साधना कम तो नहीं,
सत्य-पथ के पंथियों का काफ़िला कम तो नहीं॥
प्राण जब तक प्राण हैं, संकल्प का दीपक जले,
काल के मस्तक पर मानव-तेज का अंकन चले।
युग बदल जाएँ, मगर यह व्रत कभी झुकने न पाए,
सत्य, साहस, करुणा का ध्वज कहीं रुकने न पाए।
वज्र टूटें, काल रूठे—हौसला कम तो नहीं,
सत्य की जय-यात्रा का काफ़िला कम तो नहीं॥
- सनातन मुकुंद
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