धरती मौन ऋचा-सी गाती, सुनता कौन पुकार।
वन-उपनिषद् खुलते प्रतिपल, जागो हे संसार॥
बीज नहीं केवल माटी-कण, इनमें छिपे अनन्त विधान।
अंकुर-अंकुर लिखता रहता, जीवन का अविराम पुराण।
छाया तप का फल बन झरती, धूप स्वयं उपहार।
वन-उपनिषद् खुलते प्रतिपल, जागो हे संसार॥
नदियाँ अपने नाम विसर्जित, सागर में हो जाती लीन।
त्याग सिखाती जल-धारा, होकर स्वयं विलीन।
देना ही स्वभाव प्रकृति का, यही सृष्टि-आचार।
वन-उपनिषद् खुलते प्रतिपल, जागो हे संसार॥
पर्वत बैठे योगी बनकर, ओढ़े युग का मौन-वसन।
मेघ उन्हीं के चरण पखारें, बूँदें जपतीं जीवन-भजन।
वायु अनाहत नाद सुनाती, जग होता साकार।
वन-उपनिषद् खुलते प्रतिपल, जागो हे संसार॥
जब-जब मन ने लोभ सँजोया, सूख गया अंतस-वन।
जड़ कटते ही टूट गया फिर, अपनेपन का बंधन।
प्रकृति नहीं बाहर की सत्ता, वह अंतर-आधार।
वन-उपनिषद् खुलते प्रतिपल, जागो हे संसार॥
आओ फिर विश्वास उगाएँ, बीज बनें संस्कार।
धरती में जो ब्रह्म प्रकाशित, वह हममें साकार।
धरती मौन ऋचा-सी गाती, सुनता कौन पुकार।
वन-उपनिषद् खुलते प्रतिपल, जागो हे संसार।।
- सनातन मुकुंद
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