गुरु दीपक, शिष्य बाती, ज्ञान-सुधा उजियार,
अंतर-तम के द्वार खुलें, जागे चेतन-पार।
मृदा-मन में बीज जगे, बरसे गुरु-सुविचार,
संस्कार-सलिल से खिले, चेतन-पुष्प अपार।
अक्षर-अक्षर दीप बन, मिटे चित्त-अँधियार,
अंतर-नभ में सूर्य उगे, गुरु-वाणी आधार।
दृष्टि मिलते दृश्य ढले, खुले ज्ञान का द्वार,
शिष्य निज अंतस में पाए, दिव्य आत्म-उजियार।
नदी तजे निज स्रोत को, बहती सागर-पार,
बूँद सिंधु में लीन हो, मिटे भेद-व्यवहार।
मौन-मंत्र की छाँव में, गल जाए अहंकार,
अंतर-कुंड में सत्य जगे, नित झरे अमृत-धार।
शिक्षा बने जग-साधना, जीवन का संस्कार,
ज्ञान-लौ से हृदय जले, छलके करुणा-धार।
गुरु-ज्योति से शिष्य जगे, जगमग सकल संसार,
एक ज्योति परमात्म बने, मिटे तम-भ्रम अपार।
- सनातन मुकुंद
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