गुरु चरणों में शीश नवाएँ, श्रद्धा-सुमन चढ़ाएँ।
ज्ञान-ज्योति से जीवन अपना, हर पल जगमगाएँ॥
गुरु ही तम के अंतःपथ में, सूर्योदय बन आते।
भटके मन को सत्य-धर्म की, राह सहज दिखलाते॥
गुरु-वाणी अमृत-सी निर्मल, मिटे हृदय का भार।
उनकी कृपा से खिल उठता, जीवन का विस्तार॥
गुरु चरणों में शीश नवाएँ, श्रद्धा-सुमन चढ़ाएँ।
ज्ञान-ज्योति से जीवन अपना, हर पल जगमगाएँ॥
वेद-विचारों की गंगा बन, पावन ज्ञान बहाते।
प्रेम, दया, सेवा, समता के, मधुर मंत्र सिखलाते॥
गुरु पूर्णिमा का पुण्य-पर्व यह, वंदन का त्योहार।
शत-शत नमन गुरुचरणों को, बारंबार नमस्कार॥
गुरु चरणों में शीश नवाएँ, श्रद्धा-सुमन चढ़ाएँ।
ज्ञान-ज्योति से जीवन अपना, हर पल जगमगाएँ॥
गुरु से जागे आत्मदीप जब, मिटे भ्रमों का फेरा।
ज्ञान-वृक्ष की शीतल छाया, दे जीवन को बसेरा॥
संयम, साहस, सत्य, तपस्या—जीवन का श्रृंगार।
गुरु के पावन चरणों में है, हर सुख का आधार॥
गुरु चरणों में शीश नवाएँ, श्रद्धा-सुमन चढ़ाएँ।
ज्ञान-ज्योति से जीवन अपना, हर पल जगमगाएँ॥
ऋषि-परंपरा अमर रहे यह, जग में गूँजे वाणी।
गुरु-आशीषों से महके हर जन-मन की फुलवारी॥
भारत-भूमि रहे आलोकित, बहे ज्ञान की पावन धार।
गुरु पूर्णिमा पर करें सभी मिल, शत-शत बार नमस्कार॥
गुरु चरणों में शीश नवाएँ, श्रद्धा-सुमन चढ़ाएँ।
ज्ञान-ज्योति से जीवन अपना, हर पल जगमगाएँ॥
- सनातन मुकुंद
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