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गुरुवर! तुम्हें शत-शत नमन॥

                
                                                         
                            गुरुवर! तुम्हें शत-शत नमन,
                                                                 
                            
शत-शत नमन, शत-शत नमन।
तम से ज्योति-पथ दिखलाकर,
करते जीवन को पावन—
गुरुवर! तुम्हें शत-शत नमन॥

ज्ञान-सुधा के पुण्य-सलिल से
सींचा तुमने अंतर्मन,
अक्षर-अक्षर मंत्र बना जब,
खुला चेतना का नील गगन।
मूक अधर को स्वर प्रदान कर,
दी दृष्टि को नव-दर्शन—
गुरुवर! तुम्हें शत-शत नमन॥

माटी में संभावना देखी,
प्रतिमा का आकार दिया,
डगमग पग को धैर्य दिया,
स्वप्नों को विस्तार दिया।
गिरने पर फिर उठना सिखलाया,
हारों को कर दिया साधन—
गुरुवर! तुम्हें शत-शत नमन॥

केवल ग्रंथ नहीं पढ़ाए तुमने,
जीवन का अध्याय दिया,
विद्या को विनय, शक्ति को संयम,
कर्मों को सद्भाव दिया।
सत्य-साधना, धर्म-निष्ठता
बन पाए जीवन-आभूषण—
गुरुवर! तुम्हें शत-शत नमन॥

प्रश्नों की जब आँधी आई,
तुमने दीप जलाया था,
संशय के घनघोर तिमिर में
ज्ञान-सूर्य दिखलाया था।
दृष्टि मिली तो दूर क्षितिज तक
खुला चेतना का गगन—
गुरुवर! तुम्हें शत-शत नमन॥

तुमने कहा—“उड़ना सीखो,
पर जड़ों से संबंध रहे;
ऊँचाइयों को छूते जाना,
पर अंतस में अनुशासन रहे।
यश आए तो विनय न खोना,
शक्ति बने जन-कल्याण-सुमन।”
गुरुवर! तुम्हें शत-शत नमन॥

तुमसे सीखा—कर्म ही पूजा,
सेवा ही सम्मान है,
परहित में जो स्वयं समर्पित,
उसका जीवन महान है।
अपने सुख से ऊपर रखकर
विश्व-हित का पावन चिंतन—
गुरुवर! तुम्हें शत-शत नमन॥

एक दिवस शिष्य बढ़े आगे,
तुम पीछे रह जाते हो,
पर उसके हर श्रेष्ठ कर्म में
चुपके से मुस्काते हो।
शिष्य जहाँ भी सत्य रचेगा,
वहाँ रहेगा गुरु-स्पंदन—
गुरुवर! तुम्हें शत-शत नमन॥

पीढ़ी-पीढ़ी ज्योति जलाते,
तुम अक्षय आलोक हो,
मानवता के महामंत्र के
तुम जीवंत प्रतिरूप हो।
जब तक ज्ञान-ज्योति जग में है,
तब तक अमर तुम्हारा वंदन—
गुरुवर! तुम्हें शत-शत नमन॥

हे ज्ञानेश्वर! हे मार्गदर्शक!
हे करुणा के सिन्धु महान!
चरण-कमल में अर्पित करते
श्रद्धा, सेवा, तन-मन-प्राण।
हममें जो कुछ शुभ है, सुंदर—
उसमें तुम्हारा ही स्पंदन—
गुरुवर! तुम्हें शत-शत नमन,
शत-शत नमन, शत-शत नमन॥

दीपक तुमने हाथ दिया था,
अब हम दीप जलाएँगे;
तुमने जो संस्कार दिए हैं,
उनसे जग महकाएँगे।
गुरु-ऋण शुभ कर्मों से हम
जीवन भर चुकाएँगे।
हर शुभ कर्म बने अर्पण-सुमन—
गुरुवर! तुम्हें शत-शत नमन,
शत-शत नमन, शत-शत नमन॥
-सनातन मुकुंद
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19 घंटे पहले

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