तम में दीप जला, अंतस में उजियारा,
मौन में नाद उठा, चेतन ने पुकारा।
बूँद में सिन्धु मिला, कण में विस्तार,
दृष्टि में दृष्टा मिला, खुला आत्म-द्वार।
बीज में वन, शून्य में स्वर जागा,
देह-दीप में चिरप्रकाश जागा।
शब्द बने सेतु, मौन पारावार,
एक अक्षर में खुला अनंत संसार।
तम को छेदा नहीं, अंतर्दीप जला,
पथ बाहर न मिला, अंतःपथ खुला।
अहं-भार ढला, पथिक पथ बना,
बूँद सिंधु समाई, एक-तत्त्व बना।
ज्ञान आत्मा बना, कर्म बने चंदन,
शिष्य दीप बना, गुरु बना स्पंदन।
भेद जहाँ मिटा, सत्य वहीं प्रकट,
गुरु-तत्त्व वहीं—अखंड, अविरत।
- सनातन मुकुंद
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