मंगल-मुख से भोर सँवारे, तम का ताला खोलो बप्पा,
बुद्धि-कमल में ज्ञान जगाकर, अंतर-दीप जलाओ बप्पा।
मूषक मन की चंचल गति को, चरणों में विश्राम दो बप्पा,
अहंकार के पर्वत गलाकर, सत्य-स्वरूप दिखाओ बप्पा।
एकदंत में एकत्व छिपा है, भेद-द्वार सब तोड़ो बप्पा,
टूटी आशा जोड़ हृदय की, जीवन-वीणा छेड़ो बप्पा।
लंबोदर में विश्व समाया, सुख-दुःख दोनों साधो बप्पा,
जो कुछ आया, जो कुछ जाएगा, साक्षी बनकर देखो बप्पा।
वक्रतुंड से वक्र समय की, राह सहज कर दो बप्पा,
प्रारब्धों की धूल हटाकर, पुरुषार्थों को मोड़ो बप्पा।
मोदक जैसे मौन सत्य का, मधुर प्रसाद खिलाओ बप्पा,
बाहर खोजे जिसे जग सारा, वह निज भीतर पाओ बप्पा।
ऋद्धि-सिद्धि के द्वार खुलें जब, चित्त तुम्हारा ध्याए बप्पा,
‘मैं’ की सीमा मिटती जाए, ‘तुम’ में जीवन समाए बप्पा।
हे गणपति! तुम बुद्धि-विनायक, चेतन-दीप जगाओ बप्पा,
शरण तुम्हारी जब मन आए, निज में तुमको पाऊँ बप्पा।
- सनातन मुकुंद
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