मुट्ठी भर नीलिमा में, नील-नभ का द्वार,
बूँद में सागर झिलमिल, कण में ब्रह्म अपार।
मौन-शिखर की हिम-गुहा में, अनहद वीणा झंकृत,
श्वासों की सूक्ष्म सरगम में, ब्रह्म-स्वर हुआ मुखरित।
तम की गहरी कोख फटी, चेतन-चंद्र उभर आया,
सूनी अंतर-धरा पर फिर, ज्योति-कमल मुसकाया।
अहं-पर्वत गलकर बह निकला, करुणा-निर्मल धार,
निज-दर्पण में विश्व झिलमिल, मिटा ‘मैं’ का भार।
पंख बिना उड़ता मन-पंछी, नभ की देहरी पार,
बंधन-राख हुई जब, खुला मुक्ति का द्वार।
शून्य-गर्भ में पूर्णत्व खिला, निःशब्द हुआ संसार,
बिंदु स्वयं सिंधु बन डूबा, मिटा भेद-दीवार।
न चाँद चाहिए, न तारे, न नभ का विस्तार,
अंतर का नील अनंत ही—मेरा छोटा-सा आसमाँ।
-सनातन मुकुंद
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