आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

ब्रज की विरह-वेदना : दार्शनिक–आध्यात्मिक गीतिका

                
                                                         
                            यमुना पूछे—श्याम! कहाँ गई वह मुरली-तान?
                                                                 
                            
कदंब पुकारें—कहाँ गए वृंदावन के प्राण?
निधिवन की नीरवता में राधा का उर रोता है,
श्याम-विरह में सकल ब्रज अश्रु-मोती ढोता है।

ब्रज-रज की प्रत्येक कणिका चरण-चिह्न निहारे,
सूनी कुंज-लताएँ व्याकुल, किसको आज पुकारें?
राधा की भीगी चुनरी मौन विरह-कथा कहती है,
बूँद-बूँद में श्याम-स्मृति बन अंतर्वेदना बहती है।

राधा की चूड़ी मौन पड़ी, झंकार कहाँ से लाए?
टूटे स्वर में प्रेम-विरह के मूक आख्यान सुनाए।
सूनी कलाइयों में जैसे ठहर गई तरुणाई,
प्रेम अमर है, भले विरह ने देह-दूरियाँ बढ़ाई।

यमुना की लहरों में श्याम-स्मृति का गान बहे,
कदंबों की छाया में जैसे मुरली की तान रहे।
निधिवन, ब्रज-रज, चुनरी, चूड़ी—विरह-स्मृति के द्वार,
कृष्ण गए मथुरा, ब्रज में गूँजे बाँसुरी की पुकार।

राधा की आँखों में श्याम, श्याम के अंतस में राधा,
विरह बना वह सेतु जहाँ मिट जाती भेद की बाधा।
प्रेम न देह, न देश, न दूरी—चिरचेतन का विस्तार,
कृष्ण भले मथुरा में, ब्रज में जीवित है उनका प्यार।
- सनातन मुकुंद
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
53 मिनट पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर