यमुना पूछे—श्याम! कहाँ गई वह मुरली-तान?
कदंब पुकारें—कहाँ गए वृंदावन के प्राण?
निधिवन की नीरवता में राधा का उर रोता है,
श्याम-विरह में सकल ब्रज अश्रु-मोती ढोता है।
ब्रज-रज की प्रत्येक कणिका चरण-चिह्न निहारे,
सूनी कुंज-लताएँ व्याकुल, किसको आज पुकारें?
राधा की भीगी चुनरी मौन विरह-कथा कहती है,
बूँद-बूँद में श्याम-स्मृति बन अंतर्वेदना बहती है।
राधा की चूड़ी मौन पड़ी, झंकार कहाँ से लाए?
टूटे स्वर में प्रेम-विरह के मूक आख्यान सुनाए।
सूनी कलाइयों में जैसे ठहर गई तरुणाई,
प्रेम अमर है, भले विरह ने देह-दूरियाँ बढ़ाई।
यमुना की लहरों में श्याम-स्मृति का गान बहे,
कदंबों की छाया में जैसे मुरली की तान रहे।
निधिवन, ब्रज-रज, चुनरी, चूड़ी—विरह-स्मृति के द्वार,
कृष्ण गए मथुरा, ब्रज में गूँजे बाँसुरी की पुकार।
राधा की आँखों में श्याम, श्याम के अंतस में राधा,
विरह बना वह सेतु जहाँ मिट जाती भेद की बाधा।
प्रेम न देह, न देश, न दूरी—चिरचेतन का विस्तार,
कृष्ण भले मथुरा में, ब्रज में जीवित है उनका प्यार।
- सनातन मुकुंद
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