त्रिदल में त्रिदेवों का, सूक्ष्म रहस्य समाया है,
हरित पत्र पर शिव का, चिदाकाश मुस्काया है।
एक-एक दल में जैसे, सृष्टि-स्थिति-संहार छिपा,
भक्त-हृदय अर्पित करके, निज अहं विसराया है।
काँटों के बीच भी जैसे, साधना-फूल खिलाया है,
शीतल स्पर्श में जैसे, तप का तेज नहाया है।
शिव-चरणों में अर्पित होकर, मिटता जीव का भेद,
बिल्वपत्र ने आत्मा में, शिवत्व-दीप जलाया है।
-सनातन मुकुंद
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