अंधियारी कोठरी में, सोया था आकाश,
दीवारों की देह में, कैद पड़ा प्रकाश।
मौन निशा की गोद में, साँस हुई अंगार,
तम की तह में दबा हुआ, चेतन-संसार।
एक दरार से उतर पड़ी, स्वर्णिम एक किरण,
ज्यों शून्य-गर्भ से फूट पड़ा, आदित्य का स्पंदन।
धूलकण पर झिलमिल उठा, नभ का नील विस्तार,
कण-कण में प्रतिबिंबित हुआ, अपना ही संसार।
दीवार-दीवार लिख गया, ज्योतिर्मय संकेत,
दृष्टि खुली तो मिट गया, तम का सारा भेद।
द्वार पड़ा था खुला हुआ, बंद खड़ा था मन,
कुंजी बाहर थी ही नहीं, भीतर था स्पंदन।
भय की जंजीरें गल गईं, जागा अंतर्विवेक,
पग बढ़ते ही मिट गया, सीमाओं का भेद।
दीप न बाहर जल उठा, न नभ से उतरी भोर,
अंतरतम के गर्भ से, फूटा ज्योतिर्मय स्रोत।
कोठरी अब कक्ष न थी, कक्ष बना विस्तार,
बूँद समाई सिंधु में, मिटा पृथक्-भाव-संसार।
तम ने अपना रूप खोया, ज्योति बनी पहचान,
द्रष्टा-दृश्य विलीन हुए, शेष रहा निज ज्ञान।
न भीतर कोई बंध रहा, न बाहर कोई द्वार,
एक अखंड प्रकाश में, विलीन हुआ संसार।
अब न दीप, न सूर्य चाहिए, न नभ से माँगूँ भोर,
जिसे खोजता रहा जग में, मिला अंतर-छोर।
अंधेरी कोठरी अंततः, निकली ज्योति-निधान,
तम के गर्भ से जन्मा जो—वही अमर आत्मज्ञान॥
- सनातन मुकुंद
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X