आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

शिकायत

                
                                                         
                            वो मुझसे आजकल अक्सर शिकायत करती रहती है,,,
                                                                 
                            
तुम्हारे बाद जाने के मोहब्बत महका करती है...

बचाती फिरती रहती हूं मैं अपने आप से दामन,,,
मगर कमबख्त आंखें आईना ही देखा करती हैं...

न जाने कौन सी चादर सुकूं की छोड़ जाते हो,,,
मेरी अंगड़ाईयां बिस्तर पे हरदम सोया करती हैं...

मेरे पहलू में आने की कोई फिर से वजह ढ़ूंढ़ो,,,
तेरे पहलू में आने को मेरी जां निकला करती है...

जहां बैॆठे थे तुम पिछली दफा कुछ याद है तुमको,,,
ये पलकें आज भी उस दर से झुक कर ही निकलती हैं...

शिकायत आजकल इक ही सभी से सुनती रहती हूं,,,
ये जाने कौन सी दुनिया में सांसे लेती रहती है...

तुम्हे अब तक समझ जाना था ' सानू 'बात इतनी सी,,,
वो जिससे प्यार करती है उसी से करती रहती है...
Shanu...
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
4 वर्ष पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर