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ज़रा सी बात काफी है

                
                                                         
                            मन को भा जाए अगर, तो ज़रा सी बात काफी है !
                                                                 
                            
ज़िन्दगी जीने के लिए, अपनों का साथ काफी है !
अपने ज़मीर को बचाए रखना आसान काम नहीं,
बदनाम के लिए तो बस, एक ख़ुराफ़ात काफी है !
मारने के लिए भला खंज़र की क्या ज़रुरत दोस्त,
जो दिल को भी चाक कर दे, बस वो बात काफी है !
क्यों टूट जाते हैं ज़िन्दगी भर के अटूट रिश्ते यूं ही,
जबकि बचाने के लिए बस, एक मुलाक़ात काफी है !
क्यों बनाए चले जाते हैं लोग महल सपनों के "मिश्र",
जबकि असलियत के जज़्बे की, करामात काफी है !

- शांती स्वरूप मिश्र
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
15 घंटे पहले

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