दिन तो ढल गया, अब रोशनी में बचा क्या है
ये उम्र का तकाज़ा है, तिश्नगी में बचा क्या है
ये मोहब्बतों, नफरतों का तमाशा देखा है खूब,
निबट गया अब तो सब, ज़िंदगीं में बचा क्या है
आती है याद रिश्तों की अब तो कभी कभार,
पर उनकी भी, कडुवी चाशनी में बचा क्या है
बड़ी ही सितमगर हैं वक़्त की ये अठखेलियां,
मगर अब उसकी भी, दिल्लगी में बचा क्या है
क्या क्या रंग देखे हैं मुखौटों के पीछे हमने भी,
अब तो उनकी भी, कमीनगर्दी में बचा क्या है
खंडहर हो चुका है "मिश्र" उम्मीद का आशियाँ,
अब तो हताशा की, इस तीरगी में बचा क्या है
-शांती स्वरूप मिश्र
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