मज़हब की दुकानें, हर ठिकाने पे खुल गयी हैं
जो अपने देश को अब, मिटाने पे तुल गयी हैं
अब तो बाँट डाला हैं ईश्वर को भी टुकड़ों में,
अब सियासतें भी इसे, भुनाने पे तुल गयी हैं
यारो रोज़ देखते हैं हम तो अनर्गल सा मंज़र,
अब यारियां भी दुश्मनी, बनाने पे तुल गयी हैं
मंदिरों मस्जिदों से अब चमकती हैं सियासतें,
जो जनता को जबरिया, लड़ाने पे तुल गयी हैं
कुर्सी के अलावा न दिखता है कुछ भी उनको,
कुर्सियां ही आफ़तें अब, मचाने पे तुल गयी हैं
सोचा था 'मिश्र' कि मिट जायेंगे कोमों के मसले
मगर सियासतें तो इसको, बढ़ाने पे तुल गयी हैं
-शांती स्वरूप मिश्र
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