आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

जूनून ए मोहब्बत अब भी कम नहीं है

                
                                                         
                            जूनून ए मोहब्बत अब भी कम नहीं है यारो
                                                                 
                            
अफसोस कि जिगर में वो दम नहीं है यारो

बहुत मुश्किल है इस दुनिया को समझ पाना
जितना भी समझ पाओ वो कम नहीं है यारो

मेरी बर्बादियों का मत करो अफ़सोस ज्यादा
मुझे तो वक़्त के बदलने का ग़म नहीं है यारो

जिधर भी झांकता हूँ दिखती है वहसतें उधर
अब किसी के जिगर में वो रहम नहीं है यारो

सच है कि ज़िन्दगी की शाम होने को है "मिश्र"
पर जीने की कशिश अब भी कम नहीं है यारो

शांती स्वरुप मिश्र


हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
7 वर्ष पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर