आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

इस जुबां को भी यारो अब चलना आ गया है

                
                                                         
                            अब हमको भी चुपचाप रहना आ गया है
                                                                 
                            
जिगर की घुटन को भी सहना आ गया है
न होता है असर अब किसी की चालों का
मुखौटे हमको भी अब बदलना आ गया है
न लुभाते हैं हमको अब गुलों के दरीचे भी
यारो ख़ारों से दोस्ती अब करना आ गया है
हमतो मरते रहे बस यूं ही भोले से चेहरों पे
औक़ात उनकी भी अब समझना आ गया है
दिल की तपिश रखते हैं बस दिल में ही हम
हमें अंदर ही अंदर अब सुलगना आ गया है
नाते रिश्तों को परखा है बड़े करीब से हमने
उनके चेहरे भी हमको अब पढ़ना आ गया है
सहते रहे हैं उम्रभर अपनों की बद्जुबानियाँ
इस जुबां को भी यारो अब चलना आ गया है
-शांती स्वरूप मिश्र
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
7 घंटे पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर