अब हमको भी चुपचाप रहना आ गया है
जिगर की घुटन को भी सहना आ गया है
न होता है असर अब किसी की चालों का
मुखौटे हमको भी अब बदलना आ गया है
न लुभाते हैं हमको अब गुलों के दरीचे भी
यारो ख़ारों से दोस्ती अब करना आ गया है
हमतो मरते रहे बस यूं ही भोले से चेहरों पे
औक़ात उनकी भी अब समझना आ गया है
दिल की तपिश रखते हैं बस दिल में ही हम
हमें अंदर ही अंदर अब सुलगना आ गया है
नाते रिश्तों को परखा है बड़े करीब से हमने
उनके चेहरे भी हमको अब पढ़ना आ गया है
सहते रहे हैं उम्रभर अपनों की बद्जुबानियाँ
इस जुबां को भी यारो अब चलना आ गया है
-शांती स्वरूप मिश्र
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