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आखिर कब तक ?

                
                                                         
                            सस्ती ही नहीं !
                                                                 
                            
कोई कीमत ही नहीं है
महिला की जान की
बार बार इज्जत ही नहीं
जान से भी
धोना पड़ता है हाथ
होकर अधर्मियों का शिकार
छेदा जाता है चाकू से
दिल सीना और शरीर
कुचली जाती है
मृत होकर भी
भारी पत्थर से बार बार
दिखते है घटनास्थल से
गुजरते लोग
और उनकी गुजर चुकी
संवेदनाएँ
लहू से लाल होती है
सड़कें और अखबार
होती है राज-अनीति
पक्ष और विपक्ष में
बैठकर टीवी और सदन में
की जाती है व्याख्या
मारी जाती है फूँक
जाति धर्म की फूँकनी से
वोटों की रोटी सेकने को
घट रहा है सब कुछ
हमारी आँखों के सामनें
पर घट नहीं रही बल्कि
बढ़ रही रोज ऐसी
दुर्दांत और वीभत्स घटनाएँ
साक्षी तो नहीं
पर साक्षी है
उसका क्षत विक्षत शव
जो पड़ा है
शवों के साहिल पर
आखिर कब तक
होता रहेगा ऐसा ?
कब सीख पायेंगे
करना सम्मान महिलाओं का ?
कब बनेगी
एकता व सहमति
बेटी व महिलाओं की
इज्जत व सुरक्षा में ?
-शांतिलाल सोनी
 
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3 वर्ष पहले

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