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ये हथेलियों की है ज्यामिति

                
                                                         
                            ये हथेलियों की है ज्यामिति
                                                                 
                            
इसे समझना आसां
नहीं, चाहता है
दिल बहुत
कुछ,
कहने को बाक़ी अरमां नहीं।
लब ए बाम पर, कई
चिराग़ ए शाम
लोग जलाए
बैठे हैं,
रंगीन बुलबुलों का है मंज़र
ये उजला कोई आसमां
नहीं। जी चाहे किसी
भी नाम से
पुकारो,
बहता हुआ दरिया हूँ, ज़ब्त
करना मुझे आता है
यूँ तो कोई मेरा
निगह्बां
नहीं।
क़ौमियत का मोहर जो -
भी हो, परिंदों का
मज़हब है एक,
इस आलम

आवारगी के लिए कोई
ख़ास कारवां नहीं।
सोचो तो सारी
दुनिया है
घर
अपना वरना कुछ भी नहीं,
कोई भी नहीं मुबारक
सौ फ़ीसद, आज
हैं, कल यहाँ
नहीं।
इस भीड़ भरे भूल भुलैया में
न पा सकोगे गुमशुदा
मोती, दूरबीन से
लगते हैं सभी
बहुत
नज़दीक, ये दिल की ज़मीं है
यहाँ मुझसा कोई
तनहा नहीं।

 
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9 minutes ago

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