शिक्षक : व्यक्तित्व से अस्तित्व तक
व्यक्ति नहीं बड़ा होता, होता है व्यक्तित्व।
व्यक्तित्व से बनता है मनुष्य का अस्तित्व।।
शिक्षक नहीं पढ़ाते केवल पुस्तक।
स्वयं से पढ़ने की वे देते हैं दस्तक।।
अक्षरों से भी आगे बढकर जीवन पढ़ाते।
गिरते कदमों को फिर से चलना सिखाते।।
पढ़ लेते आँखों में छिपे सपनों की भाषा।
फिर जगा देते हैं मन में वो एक नई आशा।।
शिक्षक बढाते हौसला, विश्वास जगाते।
औरअंधियारे पथ पर दीपक बन जाते।।
जलाते रहते उत्सुकता के अनगिन दीप।
नित्य भरते रहते जीवन में नव-संगीत।।
दृष्टि देते वे दिशायुक्त दृष्टिकोण बनाते।
फिर सफलता के कई सोपान रच लाते।।
नहीं केवल मंज़िल का हमें पता बताते।
कठिनाई में चलने का साहस भी दे जाते।।
बनते कभी अनुशासन का कठोर परीक्षक।
कभी बने ममता का सागर शीतल दीक्षक।।
डाँट में भी छिपी शिष्य की उन्नति होती।
उनकी हर सीख जीवन की संपत्ति होती।।
गिली मिट्टी को आकार देकर मूर्ति बनाते।
दिव्य रंग से धरा की एक प्रतिमूर्ति सजाते।।
तम में जो स्वयं जलकर प्रकाश फैलाते।
वही एक सच्चे आदर्श शिक्षक कहलाते।।
गुरु का ऋण शब्दों से चुकता नहीं होता।
उनका दिया ज्ञान कभी व्यर्थ नहीं होता।।
वे व्यक्तित्व को एक पहचान देते हैं।
जीवन जीने का नया मुकाम देते हैं।।
नमन उन गुरु-चरणों को,
जो जीवन का अर्थ बताते हैं।
हमारे भीतर छिपे इंसान को,
हमसे ही मिलवाते हैं।।
अज्ञान-तम में भटके जन को,
ज्ञान-दीप दिखलाते हैं।
सत्य-पथ पर चलना सीखा,
गोविन्द का दरश कराते हैं।।
-शम्भु प्रसाद
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